पर्यावरण और जैव विविधता

जैव विविधता संरक्षण को मजबूती: एनबीए ने 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को वितरित किए 1.19 करोड़ रुपये

जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने पहुंच और लाभ साझाकरण (एबीएस) व्यवस्था के तहत 29 राज्य जैव विविधता परिषदों और एक केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषद को कुल 1.19 करोड़ रुपये वितरित किए हैं। यह पहल जैविक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों को स्थानीय स्तर तक पहुंचाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी।

एबीएस व्यवस्था: जैव विविधता संरक्षण का आधारस्तंभ

पहुंच और लाभ साझाकरण (एबीएस) व्यवस्था, जैविक विविधता अधिनियम, 2002 का एक मूलभूत प्रावधान है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब भी कोई कंपनी, शोध संस्थान या व्यक्ति व्यावसायिक या शोध उद्देश्यों के लिए भारत के जैविक संसाधनों या उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करता है, तो उससे होने वाले लाभ का एक हिस्सा उन स्थानीय समुदायों और क्षेत्रों तक पहुंचे जो इन संसाधनों के संरक्षक रहे हैं।

एनबीए द्वारा वितरित की गई यह राशि विभिन्न उपयोगकर्ताओं — जिनमें दवा कंपनियां, कृषि-व्यवसाय, सौंदर्य प्रसाधन निर्माता और शोध संस्थान शामिल हैं — से प्राप्त शुल्क और रॉयल्टी से आई है। यह राशि सीधे राज्य जैव विविधता परिषदों को हस्तांतरित की गई है, जो इसे जैव विविधता प्रबंधन समितियों (बीएमसी) के माध्यम से स्थानीय स्तर पर खर्च करेंगी।

कहां खर्च होगी यह राशि?

वितरित की गई निधि का उपयोग मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्यों के लिए किया जाएगा:

  • जैव विविधता रजिस्टरों (पीबीआर) का अद्यतन और रखरखाव: जन जैव विविधता रजिस्टर स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैविक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण करते हैं। इन्हें अद्यतन रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • जैव विविधता प्रबंधन समितियों का सशक्तिकरण: ग्राम पंचायत और नगर निकाय स्तर पर गठित ये समितियां जमीनी स्तर पर संरक्षण कार्यों की धुरी हैं।
  • संरक्षण और टिकाऊ उपयोग की परियोजनाएं: स्थानीय प्रजातियों का संरक्षण, पारंपरिक किस्मों का पुनरुद्धार, और टिकाऊ कटाई प्रथाओं को बढ़ावा देना।
  • क्षमता निर्माण और जागरूकता: स्थानीय समुदायों, विशेषकर युवाओं और महिलाओं को जैव विविधता के मूल्य और उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना।

राज्यवार वितरण: विकेंद्रीकरण की दिशा में कदम

यह वितरण 29 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की जैव विविधता परिषदों के बीच किया गया है। यह विकेंद्रीकृत शासन मॉडल सुनिश्चित करता है कि निर्णय लेने की शक्ति स्थानीय स्तर पर रहे। प्रत्येक राज्य परिषद अपने क्षेत्र की विशिष्ट पारिस्थितिकीय आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के आधार पर निधि का आवंटन करेगी।

उदाहरण के लिए, पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर के जैव विविधता-संपन्न राज्यों में धन का उपयोग संरक्षित क्षेत्रों के बफर जोन में सामुदायिक संरक्षण पहल के लिए किया जा सकता है, जबकि शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के राज्य पारंपरिक जल संरचना पुनरुद्धार और देशी घास प्रजातियों के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।

जैव विविधता प्रबंधन समितियां: जमीनी स्तर की असली ताकत

भारत में वर्तमान में 2.7 लाख से अधिक जैव विविधता प्रबंधन समितियां (बीएमसी) कार्यरत हैं। ये समितियां ग्राम पंचायत, नगर पालिका और नगर निगम स्तर पर गठित होती हैं और इनमें स्थानीय समुदायों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। एबीएस निधि का एक बड़ा हिस्सा इन समितियों के खातों में सीधे जाता है, जिससे वे अपनी स्थानीय प्राथमिकताओं के अनुसार संरक्षण कार्य योजना बना सकती हैं।

यह मॉडल नानाजी देशमुख के ग्रामीण विकास दर्शन के अनुरूप है, जिन्होंने स्थानीय स्वशासन और समुदाय-आधारित विकास पर जोर दिया था। प्रधानमंत्री ने हाल ही में उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए ग्रामीण विकास में उनके योगदान को रेखांकित किया था।

चुनौतियां और आगे की राह

हालांकि यह वितरण एक सकारात्मक कदम है, लेकिन कई चुनौतियां बनी हुई हैं:

  • निधि उपयोग की निगरानी: यह सुनिश्चित करना कि आवंटित राशि वास्तव में संरक्षण कार्यों पर खर्च हो, न कि प्रशासनिक खर्चों पर।
  • पीबीआर की गुणवत्ता: कई जन जैव विविधता रजिस्टर अभी भी प्रारंभिक चरण में हैं और उनमें दर्ज जानकारी की गहराई और सटीकता बढ़ाने की आवश्यकता है।
  • एबीएस अनुपालन बढ़ाना: अभी भी कई उपयोगकर्ता — विशेषकर छोटे और मध्यम उद्यम — एबीएस दायित्वों से अनजान हैं या अनुपालन नहीं कर रहे हैं।
  • लाभ साझाकरण की पारदर्शिता: स्थानीय समुदायों तक लाभ वास्तव में पहुंच रहा है या नहीं, इसकी स्वतंत्र सामाजिक अंकेक्षण व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और भारत की नेतृत्वकारी भूमिका

नागोया प्रोटोकॉल (2010), जिसके लिए भारत एक हस्ताक्षरकर्ता और शीघ्र पुष्टिकर्ता रहा है, एबीएस पर एक अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचा प्रदान करता है। भारत का घरेलू कानून — जैविक विविधता अधिनियम, 2002 — नागोया प्रोटोकॉल से पहले का है और कई मायनों में अधिक व्यापक है। एनबीए द्वारा एबीएस निधि का नियमित वितरण अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

हाल के वर्षों में, एनबीए ने एबीएस अनुपालन को सुव्यवस्थित करने के लिए ऑनलाइन पोर्टल विकसित किए हैं, जिससे उपयोगकर्ताओं के लिए आवेदन प्रक्रिया सरल हुई है और पारदर्शिता बढ़ी है। यह डिजिटल पहल राष्ट्रीय इस्पात निगम की ऑनलाइन नीलामी जैसी अन्य सरकारी डिजिटल पहलों के अनुरूप है, जिसने पारदर्शिता और राजस्व संग्रह दोनों में वृद्धि की है।

आजीविका और संरक्षण का संगम

जैव विविधता संरक्षण केवल पारिस्थितिकीय अनिवार्यता नहीं है; यह लाखों ग्रामीण और जनजातीय समुदायों की आजीविका से सीधे जुड़ा हुआ है। औषधीय पौधों का संग्रह, लघु वन उपज, पारंपरिक कृषि किस्में — ये सभी जैव विविधता पर निर्भर आजीविकाओं के उदाहरण हैं।

एबीएस निधि का उपयोग इन आजीविकाओं को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है — उदाहरण के लिए, सामुदायिक बीज बैंकों की स्थापना, पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण और बौद्धिक संपदा संरक्षण, मूल्य संवर्धन और विपणन सहायता के माध्यम से स्थानीय उत्पादों के लिए बेहतर बाजार पहुंच सुनिश्चित करना।

यह दृष्टिकोण प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के उद्देश्यों के साथ भी मेल खाता है, जो उद्यमियों को सशक्त बनाने और समृद्धि के नए द्वार खोलने पर केंद्रित है।

निष्कर्ष: सहभागी संरक्षण की ओर

एनबीए द्वारा 1.19 करोड़ रुपये का यह वितरण केवल एक वित्तीय लेनदेन नहीं है; यह एक ऐसे शासन मॉडल की पुष्टि है जहां जैव विविधता के संरक्षक — स्थानीय समुदाय — संरक्षण के लाभों के वास्तविक हकदार हैं। जैविक विविधता अधिनियम, 2002 और नागोया प्रोटोकॉल की भावना को साकार करने के लिए यह आवश्यक है कि:

  • एबीएस अनुपालन को और सख्ती से लागू किया जाए
  • निधि उपयोग की पारदर्शी निगरानी व्यवस्था बने
  • स्थानीय समुदायों की क्षमता निर्माण में निरंतर निवेश हो
  • पारंपरिक ज्ञान का सम्मान और संरक्षण सुनिश्चित हो

जब स्थानीय समुदायों को जैव विविधता संरक्षण में हिस्सेदारी और लाभ दोनों मिलते हैं, तो संरक्षण एक बाहरी दायित्व नहीं, बल्कि आंतरिक प्रेरणा बन जाता है। यही सहभागी संरक्षण की असली ताकत है, और एनबीए की यह पहल उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

स्रोत: PIB प्रेस विज्ञप्ति

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